जीव जगत में प्रचुर मात्रा में विविधताएं दिखाई पड़ती हैं। असंख्य पादप तथा प्राणियों की पहचान तथा
उनका वर्णन किया गया है; परंतु अब भी इनकी बहुत बड़ी संख्या अज्ञात है। जीवों के एक विशाल परिसर को आकार, रंग, आवास, शरीर क्रियात्मक तथा आकारिकीय लक्षणों के कारण हमें जीवों की व्याख्या करने के लिए बाधित होना पड़ता है। जीवों की विविधता तथा इनकी किस्मों के अध्ययन को सुसाध्य एवं सरल बनाने के लिए जीव विज्ञानियों ने कुछ नियमों तथा सिद्धांतों का प्रतिपादन किया, जिससे जीवों की पहचान, उनका नाम पद्धति तथा वर्गीकरण संभव हो सकें। ज्ञान की इस शाखा को वर्गिकी का नाम दिया गया है। पादपों तथा प्राणियों की विभिन्न स्पीशीज का वर्गिकी अध्ययन कृषि वानिकी और हमारे जैव-संसाधन में भिन्नता के सामान्य ज्ञान में लाभदायक सिद्ध हुए। वर्गिकी के मूलभूत आधार जैसे जीवों की पहचान, उनका नामकरण, तथा वर्गीकरण विश्वव्यापी रूप से अंतर्राष्ट्रीय कोड के अंतर्गत विकसित किया गया है। समरूपता तथा विभिन्नताओं को आधार मानकर प्रत्येक जीव को पहचाना गया है तथा उसे द्विपद नाम दिया गया। सही वैज्ञानिक तंत्र के अनुसार द्विपद नाम पद्धति, जीव वैज्ञानिक नाम जो दो शब्दों से मिलकर बना होता है, दिया जा सकता है। जीव वर्गीकरण तंत्र में अपने स्थान को प्रदर्शित करता है। बहुत से वर्ग/पद होते हैं जिन्हें
प्रायः वर्गिकी संवर्ग अथवा
टैक्सा कहते हैं। यह सभी वर्ग वर्गिकी पदानुक्रम बनाते हैं। वर्गिकीविदों ने जीव की पहचान नामकरण तथा वर्गीकरण को सुगम बनाने के लिए विभिन्न
वर्गिकी साधन सामग्री विकसित की। ये अध्ययन वास्तविक नमूनों पर किए जाते हैं जिन्हें भिन्न क्षेत्रों से एकत्रित किया जाता है। इन्हें
हरबेरियम, म्यूजियम, बोटेनिकल गार्डन, जूलॉजिकल पार्क में
संदर्भ के लिए परिरक्षित किया जाता है। हरबेरियम तथा म्यूजियम में नमूनों के एकत्रित करने तथा परिरक्
षित करने के लिए विशिष्ट तकनीक की आवश्यकता होती है। वनस्पति उद्यान अथवा चिड़िया घर
में पौधों तथा प्राणियों के जीवित नमूने होते हैं। वर्गिकीविदों ने वर्गिकी अध्ययन तथा सूचनाओं को प्रसारित करने के लिए मैनुअल तथा मोनोग्राफों को तैयार किया लक्षणों के आधार पर वर्गिकी कुंजी जीवों को पहचानने में
सहायक सिद्ध हुई हैं।

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